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किसानों ने साबित कर दिया, कितनी चिंता होती है उन्हें देश और देशवासियों की

इंसान का गुण उसके व्यक्तित्व की पहचान होती है यह साबित कर दिया नासिक के किसानों ने ।

किसानों से सरकार ने किया वादा और किसान उस वादे के पूरा होने का इंतज़ार करता रहा लेकिन जैसा अक्सर होता है सत्ता मिलने के बाद वादों को कचरे के डिब्बे में डाल दिया जाता है और किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाता है । महाराष्ट्र के नासिक शहर में भी किसानों की कुछ ऐसे स्थिति हो गई है ।

 

किसान खेती के लिए हर साल कड़ी मेहनत करता है और इस आशा से बैंकों इत्यादि से क़र्ज़ लेता है कि आने वाली फसल बढ़िया होगी तो ओ सारा क़र्ज़ चूका देगा और अपने परिवार का भी पालन पोषण कर सकेगा ।

 

जैसा की भारत की किसानी नेचर पर आधारित है और तूफान, बाढ़, सूखा इत्यादि ओ हथियार हैं जो किसान को तब जीतेजी मार देते हैं जब फसल खड़ी हो गए होती है और किसान अपने सपने को बर्बाद होता देखता रहता है । किसान का क़र्ज़ चुकाना तो दूर खाने कि लिए मोहताज़ होना पड़ता है ।

 

सरकार ने किसानों में इन्ही क़र्ज़ से मुक्त करने का आश्वासन दिया था किन्तु निभा नहीं पाई।महाराष्ट्र के नासिक से ३०००० किसानों ने सरकार को उसका किया हुआ वादा याद दिलाने के लिए नासिक से मुंबई (१८० km +) तक चलकर विधान भवन को घेरने का निश्चय किया । किसानों ने न तो कोई बस फूंका न ही दंगा फशाद किया और न ही ट्रैफिक जाम किया बल्कि नासिक से मुंबई तक १८० किलोमीटर पैदल यात्रा करके मुंबई पहुंचे ।

 

किसान दिनभर पैदल चलने के बाढ़ विश्राम करके तड़के मुंबई विधान भवन पहुंचना चाहते थे किन्तु जब उन्हें पता चला की सुबह छात्रों की परीक्षाएं होनी है तो उन्होंने विश्राम की सोंच को बदल कर छात्रों के हित के लिए रात्रि में ही पैदल चलते हुए मुंबई विधान पहुंचें ।

 

किसानों के इस कदम से उन लोगों को सीख लेना चाहिए जो अपनी मांग को मनाने के लिए तोड़ फोड़ और कतले आम का सहारा लेते हैं । सरकार ने किसानों को उनकी सभी मांगों को पूरा करने का आश्वाशन दिया और कुछ और समय की मांग की तो किसानों ने भी अपना आंदोलन वहीँ ख़त्म कर दिया । किसानों के वापसी के लिए स्पेशल ट्रेनें भी चलाये गए हैं ।

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